हड्डी दान कर मां कैंसर-संक्रमण से पीड़ित बच्चे को दे सकती है नई जिंदगी
शरीर की किसी भी हड्डी के पुनर्निर्माण में मां की फिबुला का हो सकता है इस्तेमाल, दो साल के अनुवर्ती परिणामों में दिखा नई हड्डी का विकास, अब तक छह मामलों में दिखे बेहतर परिणाम
नई दिल्ली।
हड्डी के ट्यूमर या गंभीर संक्रमण से जूझ रहे बच्चों के लिए मां की हड्डी दान करना उपचार का एक नया विकल्प बनकर उभरा है। जिन बच्चों की हड्डी का बड़ा हिस्सा निकालना पड़ता है, उनमें मां के पैर की फिबुला (निचले पैर की बाहरी हड्डी) का इस्तेमाल करके क्षतिग्रस्त हड्डी का पुनर्निर्माण किया जा सकता है। बीते पांच साल में इस तकनीक से आकाश हेल्थकेयर के ऑर्थोपेडिक्स और रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट के डायरेक्टर और हेड डॉ. आशीष चौधरी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. अरुण कुमार गिरी और ऑर्थोपेडिक्स कंसल्टेंट डॉ. अभिषेक कुमार सांभरिया ने कई बच्चों का सफल इलाज किया है। करीब पांच साल पहले बिहार के खगड़िया जिले की रहने वाली एक लड़की का सफल इलाज किया गया था। वह जांघ की हड्डी (फीमर) में पुराने संक्रमण से पीड़ित थी।

डॉ. आशीष चौधरी का कहना है कि इस तकनीक में मां की हड्डी एक मजबूत ढांचे का काम करती है, जिस पर धीरे-धीरे बच्चे के शरीर की अपनी नई हड्डी विकसित होती है। इसका उद्देश्य बच्चे के प्रभावित अंग को बचाना और उसकी कार्यक्षमता बनाए रखना है। इलाज के दौरान मरीजों में प्रत्यारोपित फिबुला के आसपास नई हड्डी विकसित होने और जांघ की हड्डी के पुनर्निर्माण के संकेत दिखाई दिए। शुरुआत में लगभग एक वर्ष तक परिणाम देखने के बाद इस तकनीक का इस्तेमाल अन्य मरीजों में भी किया गया। उनका कहना है कि पहले हड्डी के कैंसर के कई मामलों में प्रभावित अंग को काटना उपचार का प्रमुख विकल्प था। पिछले दो से तीन दशकों में अंग को बचाने और मरीज की जीवन-गुणवत्ता बेहतर करने पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है।
क्षतिग्रस्त हड्डी के पुनर्निर्माण के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। इलिजारोव तकनीक में धातु के छल्लों और बाहरी फ्रेम की मदद से हड्डी को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है। इसमें लंबा समय लग सकता है और मरीज को कई महीनों तक उपकरण के साथ रहना पड़ता है। उन्होंने इस तकनीक में 30 से 40 फीसदी तक की विफलता दर का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि फिबुला का इस्तेमाल शरीर के विभिन्न हिस्सों में हड्डी के पुनर्निर्माण के लिए किया जा सकता है। इस पर बच्चे के शरीर की कोशिकाएं धीरे-धीरे नई हड्डी विकसित करती हैं। समय के साथ प्रत्यारोपित हड्डी बच्चे की अपनी जीवित हड्डी के साथ जुड़ सकती है।
वहीं, डॉ. अरुण कुमार गिरी का कहना है कि सर्जरी के बाद ऊतक जांच की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कीमोथेरेपी तय की जाती है। शुरुआती दो वर्षों में मरीज की विशेष निगरानी की जाती है और जरूरत के अनुसार इमेजिंग जांच कराई जाती है, ताकि कैंसर के दोबारा होने या फैलने के संकेत मिल सकें।
चिकित्सकों ने बताया कि अब तक छह मामलों में सभी माताएं फिबुला दान करने के लिए चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त पाई गईं। उनके अनुसार, मां की हड्डी के अलावा पिता की फिबुला का भी विकल्प हो सकता है, यदि मां किसी चिकित्सकीय कारण से दान करने में सक्षम न हो। हालांकि, दानदाता का चयन उसकी स्वास्थ्य स्थिति और विशेषज्ञों की जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।
चिकित्सकों ने यह भी बताया कि मां की हड्डी निकालने के बाद कई माताएं अगले दिन से ही बच्चे की देखभाल करने लगी थीं।
वहीं, उज्बेकिस्तान से आए पीड़ित समीर की मां नरगिशा ने बताया कि डॉ. आशीष ने इस विकल्प के बारे में बताया था। इसे सुनकर उन्हें पूरा भरोसा हो गया कि अब उनका बच्चा फिर से दौड़ सकेगा। वहीं, पहली मरीज ने बताया कि वह पहले चल भी नहीं पाती थी, लेकिन अब सामान्य जिंदगी जी रही है।
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