फोन से दवा की प्रतिकूल प्रतिक्रिया रिपोर्ट करें, सुरक्षित दवा के लिए सहयोग करें- सुनील यादव

ऐप या 1800-180-3024 पर करें ADR की सूचना, मरीज स्वयं भी कर सकता है रिपोर्ट

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Lucknow: दवा के साइड इफेक्ट पहले से लिखे मिलते हैं, लेकिन कभी- कभी दवा की अन्य प्रतिक्रिया भी सामने आ जाती है, जो गंभीर भी हो सकती है, जिसका नियमित पर्यवेक्षण मरीज के लिए आवश्यक है। दवा लेने के बाद यदि किसी मरीज को कोई संदिग्ध प्रतिकूल दवा प्रतिक्रिया (Adverse Drug Reaction–ADR) होती है, तो उसकी सूचना आसानी से फोन के माध्यम से दी जा सकती है।

PvPI की टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-180-3024 उपलब्ध

इसके लिए फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI) की टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-180-3024 उपलब्ध है। स्वास्थ्यकर्मी ही नहीं, बल्कि मरीज और आम नागरिक भी स्वयं एडीआर की रिपोर्ट कर सकते हैं। दवा की सुरक्षा सुनिश्चित करने, गंभीर नुकसान को रोकने के लिए इस सप्ताह जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से सभी का ध्यान आकृष्ट किया जा रहा है।

आम जनता एवं फार्मासिस्टों से एडीआर की रिपोर्टिंग की अपील

उत्तर प्रदेश स्टेट फार्मेसी काउंसिल के पूर्व चेयरमैन एवं फार्मासिस्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सुनील यादव ने आम जनता एवं फार्मासिस्टों से एडीआर की रिपोर्टिंग की अपील की है। सुनील यादव ने कहा कि दवाओं से होने वाली प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं की समय पर सूचना देना मरीजों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

फार्माकोविजिलेंस सप्ताह की थीम

उन्होंने कहा कि इस वर्ष के छठे राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह (17–23 सितंबर 2026) की थीम है— “Promoting Rational Use of Medicines through Pharmacovigilance: A Step Towards Safer Healthcare” “फार्माकोविजिलेंस के जरिए दवाओं के सही इस्तेमाल को बढ़ावा देना: सुरक्षित हेल्थकेयर की ओर एक कदम।”

वैज्ञानिक मूल्यांकन और दवाओं का तर्कसंगत उपयोग

सुनील यादव ने कहा कि प्रत्येक एडीआर रिपोर्ट, प्रत्येक सेफ्टी सिग्नल का वैज्ञानिक मूल्यांकन और दवाओं के तर्कसंगत उपयोग की हर कोशिश मरीजों की सुरक्षा को मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि यह सप्ताह सुरक्षित दवाओं और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को दोहराने का अवसर है।

क्या है फार्माकोविजिलेंस?

सुनील यादव ने बताया कि Pharmacovigilance का सामान्य अर्थ दवाओं की सुरक्षा के प्रति सतर्कता है। इसके अंतर्गत दवाओं के उपयोग से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों और संभावित जोखिमों की पहचान, रिपोर्टिंग, मूल्यांकन, निगरानी और रोकथाम की जाती है। उन्होंने कहा कि किसी दवा के कुछ दुष्प्रभाव पहले से ज्ञात हो सकते हैं, लेकिन कुछ अप्रत्याशित या नए प्रतिकूल प्रभाव दवा के व्यापक उपयोग के बाद सामने आ सकते हैं। इसलिए किसी दवा से संबंधित संदिग्ध प्रतिकूल प्रतिक्रिया की रिपोर्ट करना महत्वपूर्ण है। PvPI सभी प्रकार की संदिग्ध ADRs—चाहे वे ज्ञात या अज्ञात, गंभीर या गैर-गंभीर, सामान्य या दुर्लभ हों, की रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करता है।

कौन कर सकता है एडीआर की रिपोर्ट?

ADR की रिपोर्टिंग केवल डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। डॉक्टर, फार्मासिस्ट, नर्स सहित अन्य स्वास्थ्यकर्मी तथा मरीज/उपभोक्ता भी ADR रिपोर्ट कर सकते हैं।

रिपोर्ट करने के प्रमुख माध्यम—

टोल-फ्री हेल्पलाइन: 1800-180-3024

ADR PvPI मोबाइल ऐप

एडीआर रिपोर्टिंग फॉर्म

निकटतम एडीआर मॉनिटरिंग सेंटर (AMC)

ऑनलाइन ADRMS प्रणाली

एडीआर रिपोर्टिंग की सुविधाएं उपलब्ध

IPC के अनुसार मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एडीआर रिपोर्टिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं। हेल्पलाइन को IPC ने बहुभाषी IVR प्रणाली के रूप में भी विकसित किया है, जिससे विभिन्न भारतीय भाषाओं में ADR रिपोर्टिंग को सुगम बनाया गया है।

रिपोर्ट करने से क्या होता है?

सुनील यादव ने बताया कि प्राप्त एडीआर रिपोर्टों को वैज्ञानिक तरीके से एकत्रित और विश्लेषित किया जाता है। PvPI का उद्देश्य दवाओं से संबंधित नए safety signals की पहचान करना और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर दवा की सुरक्षा से संबंधित जानकारी तैयार करना है।

दवा निश्चित रूप से नुकसानदायक सिद्ध 

आवश्यकता पड़ने पर नियामक संस्थाओं को उचित कार्रवाई के लिए जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। उन्होंने कहा कि एडीआर रिपोर्ट करने का अर्थ यह नहीं है कि रिपोर्ट की गई दवा निश्चित रूप से नुकसानदायक सिद्ध हो गई है। रिपोर्ट एक संभावित सुरक्षा संकेत होती है, जिसका आगे वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है।

रोगी की गोपनीयता का ध्यान

एडीआर रिपोर्टिंग में मरीज और रिपोर्टकर्ता की जानकारी के संरक्षण का भी महत्व है। PvPI के मार्गदर्शन के अनुसार रिपोर्टकर्ता की पहचान को गोपनीय रखा जाता है।

थैलिडोमाइड ट्रेजडी से मिली बड़ी सीख

सुनील यादव ने फार्माकोविजिलेंस के इतिहास का उल्लेख करते हुए थैलिडोमाइड त्रासदी को दवा सुरक्षा के क्षेत्र की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना बताया। 1950–60 के दशक में थैलिडोमाइड के उपयोग के बाद हजारों बच्चों में गंभीर जन्मजात विकृतियां, विशेष रूप से फोकोमेलिया (Phocomelia), सामने आईं।

निगरानी और नियामक व्यवस्था की आवश्यकता 

इस घटना ने दवाओं की सुरक्षा की प्रभावी निगरानी और नियामक व्यवस्था की आवश्यकता को विश्व स्तर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक घटना से यह महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि दवा के बाजार में उपलब्ध होने के बाद भी उसकी सुरक्षा की निरंतर निगरानी आवश्यक है।

PvPI कब शुरू हुआ?

भारत में राष्ट्रव्यापी Pharmacovigilance Programme की शुरुआत जुलाई 2010 में हुई थी। प्रारंभ में AIIMS, नई दिल्ली राष्ट्रीय समन्वय केंद्र था और अप्रैल 2011 में National Coordination Centre की जिम्मेदारी Indian Pharmacopoeia Commission (IPC), गाजियाबाद को स्थानांतरित की गई।

मटेरिओविजिलेंस भी महत्वपूर्ण

सुनील यादव ने कहा कि केवल दवाओं की ही नहीं, बल्कि medical devices की सुरक्षा की निगरानी भी आवश्यक है। भारत में इसके लिए Materiovigilance Programme of India (MvPI) संचालित है। इसका उद्देश्य चिकित्सा उपकरणों से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग, मूल्यांकन और निगरानी के माध्यम से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता करना है। उन्होंने कहा कि दवा हो या चिकित्सा उपकरण—सुरक्षा से जुड़ी किसी भी संदिग्ध घटना को छिपाने के बजाय रिपोर्ट करना मरीजों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

फार्मासिस्ट फेडरेशन चलाएगा जागरूकता अभियान

सुनील यादव ने बताया कि फार्मासिस्ट फेडरेशन द्वारा राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के दौरान फार्मासिस्टों, विद्यार्थियों, स्वास्थ्यकर्मियों एवं आम जनता के बीच एडीआर रिपोर्टिंग और दवाओं के तर्कसंगत उपयोग के प्रति जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने आम जनता से अपील की “दवा से कोई संदिग्ध प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो तो उसे नजरअंदाज न करें। समय पर रिपोर्ट करें। आपकी एक रिपोर्ट किसी दूसरे मरीज को संभावित नुकसान से बचाने में मदद कर सकती है।”

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