जितिया व्रत 3 अक्टूबर को, पुत्र की दीर्घायु के लिए माताएं रखेंगी निर्जला व्रत

इस साल वरीयान योग और आर्द्रा नक्षत्र का दुर्लभ संयोग, कुबेर हैं वरीयान योग के स्वामी

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Lucknow: पुत्र के दीर्घायु, सुखी और निरोगी जीवन के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत, जितिया या जीमूतवाहन व्रत इस साल 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। हर वर्ष यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह जानकारी ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल ने दी।

इस वर्ष जितिया व्रत के दिन मिथुन राशि में रहेगा चंद्रमा

लखनऊ में अलीगंज स्थित स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल ने बताया कि अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को प्रातः 07:59 बजे से प्रारंभ होकर 4 अक्टूबर को प्रातः 05:51 बजे तक रहेगी। इस वर्ष जितिया व्रत के दिन चंद्रमा मिथुन राशि में रहेगा, साथ ही वरीयान योग और आर्द्रा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। वरीयान योग सुबह से लेकर दोपहर 3:21 बजे तक रहेगा, इसके बाद परिघ योग प्रारंभ होगा।

जितिया के दिन आर्द्रा नक्षत्र पूरे दिन रहेगा 

वरीयान को शुभ योग माना गया है और इसके स्वामी धन के देवता कुबेर माने जाते हैं। जितिया के दिन आर्द्रा नक्षत्र पूरे दिन रहेगा और मध्य रात्रि 1:29 बजे तक इसका प्रभाव रहेगा। प्रदोष काल में गंधर्वराज जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करने की परंपरा है। इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखती हैं, जिसमें जल, फल या अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है। 4 अक्टूबर को व्रत का पारण किया जाएगा।

जानें पूजा विधि

स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें। इसके लिए कुशा से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करें। इस व्रत में मिट्टी और गाय के गोबर से चील व सियारिन की मूर्ति बनाई जाती है। इनके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनें। पारण के बाद यथाशक्ति दान और दक्षिणा दें।

जितिया व्रत की कथा

जितिया व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में अपने पिता की मौत का बदला लेने की भावना से अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार दिया, परंतु वे द्रौपदी की पांच संतानें थीं। फिर अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि ले ली।

उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का किया था प्रयास

अश्वत्थामा ने फिर से बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का प्रयास किया और उसने ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ को नष्ट कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरने के बाद जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया। तब से ही संतान की लंबी उम्र के लिए जितिया का व्रत रखा जाने लगा।

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