स्वामी अभेदानन्दजी एक आदर्श योगी थे, जो अमर हो गये: स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज

बचपन से ही बहुत मेघावी थे स्वामी अभेदानन्दजी

25,137

Lucknow: स्वामी अभेदानन्दजी एक आदर्श योगी थे। जन्म लग्न में वह पद्माशन में बैठे हुये भूमिष्ठ हुये थे। जब भगवान श्री रामकृष्ण के साथ उनका प्रथम दर्शन हुआ तब श्री रामकृष्ण ने उनको कहा कि तुम पूर्व जन्म में एक महान योगी थे, यही तुम्हारा अन्तिम जन्म है।

जीवनी एवं संदेश पर प्रवचन दे रहे थे महाराज

Lucknow
Lucknow

यह जानकारी लखनऊ में निराला नगर स्थित रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने दिए। वह सोमवार को मठ में जयंती पर स्वामी अभेदानन्दजी के जीवनी एवं संदेश पर प्रवचन दे रहे थे। स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने आगे बताया कि कलकत्ता का आहिरिटोला में 2 अक्टूबर 1866 में स्वामी अभेदानन्दजी का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही बहुत मेघावी थे। संस्कृत में उनकी अत्यन्त पारदर्शिता थी। श्री रामकृष्ण एवं श्री माँ सारदा देवी के अनेक स्तोत्रां की रचना करके वह अमर हो गये।

1897 में न्यूयार्क वेदान्त केन्द्र का बने परिचालक

स्वामी विवेकानन्द के आह्वान से वेदान्त प्रचार करने के लिए वे 1896 ई. में लंदन पहुँचे एवं 1897 में न्यूयार्क वेदान्त केन्द्र का परिचालक बने। सुदीर्घ 25 साल अमेरिका के विभिन्न प्रान्त में सफलता के साथ वेदान्त प्रचार करने के उपरान्त सन् 1921 में भारत लौटे।
भारत लौटते समय उन्होंने जापान, चीन, फिलीपींस, सिंगापुर, कुआलालंपुर और रंगून का दौरा किया और उन जगहों पर भी स्वामी जी के संदेश का प्रचार किया। 1922 में 57 वर्ष की अवस्था में उन्होंने पैदल ही हिमालय पार किया और तिब्बत पहुँचे, जहाँ उन्होंने बौद्ध दर्शन और तिब्बती बौद्ध धर्म का अध्ययन किया।

वर्षो से खोए हुए एक पांडुलिपि खोजने का दावा

Lucknow
Lucknow

हेमिस मठ में, उन्होंने ईसा मसीह के वर्षो से खोए हुए एक पांडुलिपि खोजने का दावा किया, जिसे स्वामी अभेदानन्द की कश्मीर और तिब्बत यात्रा पुस्तक में शामिल किया गया है। भारत पहुँचने के बाद, उन्होंने एक लंबी यात्रा शुरू की और तिब्बत और काबुल तक गए। उन्होंने अपनी वापसी यात्रा में पेशावर, पंजाब और उत्तरी भारत के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का भी दौरा किया और 1923 में बेलूर मठ पहुँचे।

अब रामकृष्ण वेदांत मठ के नाम से जाना जाता है…

उन्होंने 1923 में कोलकाता में रामकृष्ण वेदांत सोसाइटी का गठन किया, जिसे अब रामकृष्ण वेदांत मठ के नाम से जाना जाता है। 1924 में, उन्होंने बंगाल प्रेसीडेंसी (अब पश्चिम बंगाल) के दार्जिलिंग में रामकृष्ण वेदांत मठ की स्थापना की। 1927 में, उन्होंने रामकृष्ण वेदांत सोसाइटी की मासिक पत्रिका विश्ववाणी का प्रकाशन शुरू किया, जिसका उन्होंने 1927 से 1938 तक संपादन किया तथा 1936 में, उन्होंने रामकृष्ण के जन्म शताब्दी समारोह के एक भाग के रूप में, कलकत्ता के टाउन हॉल में धर्म संसद की अध्यक्षता की एवं 8 सितम्बर 1939 में उनका महासमाधि हुआ।

रामकृष्ण मठ के संन्यासीवृन्द का दशनामी संन्यासी सम्प्रदाय को अन्तर्भुक्त करने के लिए रहेंगे चिरस्मरणीय

स्वामी जी ने कहा कि रामकृष्ण मठ में शास्त्र पाठ (स्वाघ्याय) प्रवर्तन करने के लिए उनके विशेष योगदान एवं रामकृष्ण मठ के संन्यासीवृन्द का दशनामी संन्यासी सम्प्रदाय को अन्तर्भुक्त करने के लिए वह चिरस्मरणीय रहेंगे। उनके रचित श्री रामकृष्ण ध्यानमंत्र एवं श्री माँ सारदा देवी के ध्यानमंत्र हमेशा के लिए साधकों का आध्यात्मिक जीवन में अनुप्रेरणा का स्रोत रहेगा।

भव्य रूप से मनाया गयी जयंती

Lucknow
Lucknow

प्रवचन के बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ। स्वामी अभेदानन्द जयंती भव्य रूप से मनाया गयी। सुबह 4ः30 बजे शंखनाद व मंगलारती के बाद वैदिक मंत्रोच्चारण, ’नारायण शुक्तम’ का पाठ और ’जय जय रामकृष्ण भुवन मंगल’ का समूह में गायन मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज के नेतृत्व में हुआ। स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज का ऑनलाइन सत् प्रसंग हुआ। मुख्य मंदिर में संध्यारति के उपरांत स्वामी सारदानन्दजी द्वारा रचित ’सपार्षद-श्री रामकृष्ण स्तोत्रम’ का पाठ एवं स्वामी अभेदानन्दजी महाराज द्वारा रचित रामकृष्णस्तवराजः श्री रामकृष्ण पर प्रार्थना मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द के नेतृत्व में की गई।

Comments are closed.