नई दिल्ली
राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एनएचआरडीएफ) द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम “मशरूम उत्पादन तकनीक एवं सस्योत्तर प्रबंधन” में किसानों और युवाओं को पराली व भूसी के वैज्ञानिक उपयोग और निस्तारण की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, उत्तराखण्ड और दिल्ली से आए 25 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि धान की पराली और गेहूं की भूसी जैसे कृषि अवशेष अक्सर जलाए जाते हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को इन अवशेषों के सही प्रबंधन के तरीके सिखाए गए, जिनमें मशरूम उत्पादन को सबसे प्रभावी विकल्प बताया गया।
प्रशिक्षण समन्वयक एस. सी. तिवारी ने समझाया कि पराली व भूसी को प्रोसेस कर मशरूम उत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाला सब्सट्रेट तैयार किया जा सकता है। इससे न सिर्फ खेती में कचरे का पुनः उपयोग होता है बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है। तिवारी ने बटन, ऑयस्टर, मिल्की और शिटाके मशरूम की खेती में उपयोग होने वाली तकनीकों का现场 प्रदर्शन किया और उत्पादन प्रक्रिया में आम समस्याओं व उनके समाधान पर भी विस्तार से चर्चा की।
प्रतिभागियों को व्यवहारिक अनुभव देने के लिए उन्हें मशरूम अनुसंधान एवं विकास केंद्र और धनखड़ फार्म, सोनीपत का भ्रमण कराया गया, जहां उन्होंने सब्सट्रेट तैयार करने, बीज डालने, जल प्रबंधन और फसल कटाई की चरणबद्ध प्रक्रियाएँ करीब से देखीं।
प्रशिक्षुओं ने बताया कि इस प्रशिक्षण ने उन्हें पराली जलाने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन में बदलने का व्यावहारिक तरीका सिखाया है। उनके अनुसार, मशरूम उत्पादन के माध्यम से न केवल प्रदूषण कम किया जा सकता है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और आय बढ़ाने का नया रास्ता भी खुलता है।
समापन सत्र में अतिरिक्त निदेशक पी. के. गुप्ता ने कहा कि कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक निस्तारण भविष्य की आवश्यकता है, और मशरूम उत्पादन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण समाधान साबित हो रहा है। उन्होंने प्रतिभागियों को अपने क्षेत्रों में इस ज्ञान का प्रसार कर अधिक से अधिक किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रेरित किया।
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